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सदानीरा समागम का शुभारंभ

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भोपाल 

जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत जल संरक्षण, भारतीय संस्कृति, पंचमहाभूतों तथा सतत् विकास के विषयों पर केन्द्रित 'सदानीरा समागम' का शुभारंभ भारत भवन में हुआ। शुभारंभ अवसर पर अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास और धर्मस्व एवं सामान्य प्रशासन शिवशेखर शुक्ला ने कहा कि यह आयोजन जल, प्रकृति और मानव सभ्यता के संबंधों पर केंद्रित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय चिंतन-यात्रा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश जल संरक्षण और जल आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। भारतीय संस्कृति में जल जीवन, चेतना और सभ्यता का आधार है तथा सदानीरा समागम परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बनेगा।

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अपर मुख्य सचिव शुक्ला ने कहा कि समागम में देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं के विशेषज्ञों के साथ नौ देशों के राजनयिक प्रतिनिधि भी सहभागी हो रहे हैं। जल, पर्यावरण, नवकरणीय ऊर्जा और सतत विकास पर केंद्रित यह आयोजन वैश्विक सहयोग और जनभागीदारी को नई दिशा प्रदान करेगा। इस अवसर पर जेके ट्रस्ट के सीएसआर प्रमुख राम भटनागर, प्रख्यात जलविद् राजेन्द्र सिंह, हिन्दुस्तान यूनिलिवर फाउंडेशन के सीईओ डॉ. श्रमण झा, आईजीआरएमएस के डायरेक्टर डॉ. अमिताभ पांडेय, आईआईएम बोधगया की डायरेक्टर डॉ. विनिता सहाय, वीर भारत न्यास के न्यासी सचिवराम तिवारी, यूनाइटेड कॉनसियसनेस के संयोजक डॉ. विक्रांत सिंह तोमर उपस्थित थे।

जलतत्व पर केन्द्रित प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए प्रख्यात जलविद् राजेन्द्र सिंह ने कहा कि ऋग्वेद और अथर्ववेद में जल संरक्षण को लेकर वैज्ञानिक और दूरदर्शी दृष्टि प्रस्तुत की गई है। भारतीय ज्ञान परंपरा में जल को जीवन और सृष्टि के संतुलन का आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि पंचमहाभूतों के संतुलन के बिना मानव जीवन संभव नहीं है तथा पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक के साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान को अपनाना आवश्यक है। उन्होंने शिक्षा और ज्ञान का अंतर बताते हुए कहा कि ज्ञान मनुष्य को संस्कृति, प्रकृति और समाज से जोड़कर जल एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाती है तथा शिक्षा मनुष्य की दृष्टि को व्यवसायिक बनाती है।

इस अवसर पर जेके ट्रस्ट के सीएसआर प्रमुख राम भटनागर ने कहा कि मध्यप्रदेश में कॉर्पोरेट क्षेत्र की सहभागिता से ग्रामीण अंचलों में पशुओं के स्वास्थ्य, संरक्षण और संवर्धन को लेकर व्यापक स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की मंशा के अनुरूप मध्यप्रदेश को दुग्ध उत्पादन और डेयरी विकास के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाने की दिशा में सतत् प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए आधुनिक तकनीक, उन्नत पशु स्वास्थ्य सेवाओं, संतुलित पोषण तथा ग्रामीण सहभागिता को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है।

हिन्दुस्तान यूनिलिवर फाउंडेशन के सीईओ डॉ. श्रमण झा ने कहा कि जल संकट विश्व के सामने गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। जल स्रोतों के क्षरण, अनियमित वर्षा, भूजल के अत्यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन के कारण स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। जल संरक्षण और प्रभावी जल प्रबंधन के बिना जलवायु परिवर्तन की किसी भी रणनीति को सफल नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने जल संरक्षण के लिए समर्पित बजट प्रावधान, जनभागीदारी, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण तथा पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर बल दिया।

आईजीआरएमएस के डायरेक्टर डॉ. अमिताभ पांडेय ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जीवन-मूल्यों का विशेष महत्व है और इन्हीं मूल्यों से प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती है। भारतीय परंपरा जल को जीवन और लोककल्याण का आधार मानती है, इसलिए जल के उपयोग में संयम, सामूहिकता और जिम्मेदारी का भाव आवश्यक है। नई पीढ़ी में जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व के संस्कार विकसित करने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि केवल जागरूकता नहीं, बल्कि व्यवहारिक आचरण से ही जल और पर्यावरण को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

आईआईएम बोधगया की डायरेक्टर डॉ. विनिता सहाय ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी भारतीय ज्ञान, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से दूर होती जा रही है। भारतीय समाज ने हमेशा सीमित संसाधनों में प्रकृति-सम्मत जीवन शैली अपनाई, लेकिन आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली के कारण यह परंपरा कमजोर हुई है। संयुक्त परिवारों के विघटन और मोबाइल-गैजेट्स के बढ़ते प्रभाव से संस्कारों एवं जीवन के अनुभवों का हस्तांतरण कम हुआ है। भविष्य में पानी सबसे मूल्यवान करेंसी साबित होगा। इसलिए युवाओं को जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और भारतीय जीवन-मूल्यों को अपनाकर प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

प्रकृति को सम्मान देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता : सुश्री जायसवाल

 दूसरे सत्र पृथ्वी तत्व को संबोधित करते हुए जेके सीमेंट सीएसआर प्रमुख सुश्री शिल्पा जायसवाल ने कहा कि भारतीय परिवारों में पूजा-पाठ , संस्कारों और परंपराओं के माध्यम से बच्चों को प्रकृति एवं पंचतत्वों का ज्ञान दिया जाता रहा है। प्रकृति मनुष्य को प्रेम और सम्मान का पाठ पढ़ाती है, किंतु जब तक प्रेम के साथ सम्मान का भाव नहीं जुड़ता, तब तक प्रकृति का संरक्षण संभव नहीं है। कोविड के बाद मौसम और हवाओं में आए बदलाव पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत हैं। विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए। जलवायु परिवर्तन से महिलाएँ और युवा सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को छोटे-छोटे प्रयासों से प्रकृति को कुछ लौटाने का संकल्प लेना चाहिए।

प्राकृतिक संसाधन भावी पीढ़ियों की अमानत हैं : आर. पवित्र कुमार

जेएसडब्ल्यू फाउंडेशन के सीईओ आर. पवित्र कुमार ने कहा कि मानव जीवन पंचतत्व-जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश-पर आधारित है। वर्तमान में उपयोग किए जा रहे प्राकृतिक संसाधन वास्तव में आने वाली पीढ़ियों से लिया गया उधार हैं, इसलिए उनका संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। जेएसडब्ल्यू फाउंडेशन जलवायु संरक्षण और प्रकृति-आधारित समाधानों पर कार्य कर रहा है तथा समाज के सक्षम वर्ग से पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

ईको-टूरिज्म प्रकृति संरक्षण और आजीविका का प्रभावी माध्यम : एल. कृष्णमूर्ति

एमपीईडीबी के सीईओ एल. कृष्णमूर्ति ने पर्यटन एवं ईको टूरिज्म विषय पर विचार रखते हुए कहा कि मध्यप्रदेश देश में सर्वाधिक टाइगर रिजर्व वाला राज्य है, जहाँ नौ टाइगर रिजर्व वन्यजीव संरक्षण की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं। जंगल को समझने के लिए दृष्टि और संवेदनशीलता विकसित करना आवश्यक है, क्योंकि वन केवल बाघ देखने का स्थान नहीं, बल्कि जैव विविधता का जीवंत संसार हैं। भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षी और वन्यजीव सदैव आस्था और परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

नदियों को एनवायरमेंटल पर्सनहुड का दर्जा देने की आवश्यकता : डॉ.श्रीवास्तव

बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. प्रदीपवास्तव ने कहा पानी के बारे में सोचना दरअसल पूरी पृथ्वी और उसके पारिस्थितिक तंत्र के बारे में सोचना है। नर्मदा नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि नदी के किसी एक हिस्से में होने वाला परिवर्तन सैकडों किलोमीटर दूर तक प्रभाव डालता है। डॉ.वास्तव ने नदियों को एनवायरमेंटल पर्सनहुड का दर्जा देने की आवश्यकता बताते हुए संदेश दिया- थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली तथा पानी वस्तु नहीं, देवता है।

तीसरा सत्र वायु तत्व पर रहा केन्द्रित

सदानीरा समागम के प्रथम दिवस का तीसरा सत्र वायु तत्व पर केन्द्रित रहा। इस सत्र में इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र के समूह निदेशक डॉ. ईश्वर चंद्र दास, नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग के एसीएस मनुवास्तव, आईआईएफएम भोपाल के प्रो. योगेश दुबे, पर्यावरणविद् पतंजलि झा ने वायु प्रदूषण, वायु गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छ वायु अभियानों पर चर्चा की।

समागम के दूसरे दिन अग्नि तत्व और आकाश तत्व पर होगी चर्चा

सदानीरा समामग के दूसरे दिन अग्नि तत्व और आकाश तत्व पर देश-प्रदेश के विद्वानों द्वारा विमर्श किया जायेगा, जिसमें इसरो के निदेशक प्रकाश चौहान, इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र के समूह निदेशक डॉ. ईश्वर चंद्र दास, टाटा ट्रस्ट के सलाहकार एच.एन.निवास, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. विनय कुमार पांडे, ओएनजीसी के पीयूष प्रेरित आर्य तथा प्रो. राम नारायण द्विवेदी, टाटा संस के चाको थॉमस, हिंडाल्को के सीएसआर प्रमुख अविजित, वेदांता समूह की अनुपम निधि तथा कैल्डेरिस की उत्सवी दीपक रहेंगे।

 

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