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रामायण-महाभारत की 5 दिव्य तलवारें, जिनकी शक्ति के आगे बड़े-बड़े योद्धा भी थे बेबस

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हमारे हिंदू धर्म में ऐसी कई दिव्य शक्तियों और अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन मिलता है, जिनका सामना करना बड़े-बड़े योद्धाओं और यहां तक कि देवताओं के लिए भी आसान नहीं था. कहा जाता है कि इनमें से कुछ तलवारें इतनी शक्तिशाली थीं कि उनके सामने सामान्य अस्त्र-शस्त्र टिक ही नहीं सकते थे.

हिंदू महाकाव्यों में कई ऐसे दिव्यास्त्र और शस्त्रों का जिक्र मिलता है, जिन्हें संभाल पाना या उनका इस्तेमाल करना आम योद्धाओं के बस की बात नहीं थी. इन्हीं दिव्य शस्त्रों में तलवार और खड़ग का भी विशेष स्थान था. रामायण और महाभारत में हमें कई ऐसे योद्धाओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने वरदान, तपस्या या अपनी युद्ध-कला के बल पर इन दिव्य शस्त्रों को प्राप्त किया था.

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वैसे शस्त्रों की श्रेणी में एक होती है तलवार, जिसकी एक या दोनों धारें हो सकती हैं, जबकि खड़ग आमतौर पर चौड़ी और बेहद धारदार तलवार के रूप में वर्णित किया जाता है. लेकिन आज हम बात करेंगे उन दिव्य तलवारों और खड़ग की, जिन्हें पौराणिक कथाओं में असाधारण शक्तियों से युक्त बताया गया है. तो चलिए जानते हैं रामायण और महाभारत से जुड़ी पांच शक्तिशाली तलवारों के बारे में, जिनके स्वामी महान योद्धा माने जाते हैं.

कौशल्य तलवार
सबसे पहली तलवार आती है कौशल्य तलवार. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस तलवार का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा जी ने किया था और इसे देवताओं के गुरु बृहस्पति से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि बृहस्पति जी ने राक्षसों और असुरों से अपनी रक्षा के लिए इस दिव्य तलवार का इस्तेमाल किया. बाद में जब गंगापुत्र भीष्म ने उनसे शिक्षा प्राप्त की, तो यह तलवार भीष्म को प्राप्त हुई.

आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले भीष्म अपने तपोबल और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध थे. कहा जाता है कि उन्होंने इस तलवार की शक्ति को अपनी साधना और पराक्रम से और अधिक प्रभावशाली बना दिया था. परशुराम जी के साथ हुए युद्ध के प्रसंग में भी भीष्म के अद्भुत युद्ध कौशल का वर्णन मिलता है. वहीं महाभारत के युद्ध में भी उनकी तलवारबाजी का भयंकर रूप देखने को मिला. कहा जाता है कि जब नकुल की तलवार और भीष्म की तलवार आपस में टकराई, तो उनके टकराने से इतनी तेज चमक पैदा हुई कि आसपास मौजूद सैनिक कुछ समय के लिए ठीक से देख नहीं पाए.

भीष्म पितामह ने अभिमन्यु के कई दिव्य बाणों को भी अपनी तलवार से काट दिया था. इस तलवार की धार और बनावट को लेकर पौराणिक कथाओं में विश्वकर्मा जी की अद्भुत शिल्पकला का वर्णन किया जाता है.

एक कथा के अनुसार, राजा पांडु ने भी युद्ध में जाने से पहले भीष्म से यह तलवार मांगी थी, लेकिन भीष्म ने इसे देने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि इस तलवार का इस्तेमाल हर कोई नहीं कर सकता था.

असी तलवार
दूसरी है असी तलवार. महाभारत के शांतिपर्व में असी के प्रकट होने से जुड़ी एक अद्भुत कथा मिलती है. कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर अधर्म और असुरों का प्रभाव बढ़ने लगा, तब ऋषियों ने यज्ञ किया था. यज्ञ के दौरान एक भयंकर आकृति प्रकट हुई. उसका स्वरूप असाधारण था. इसके बाद वह आकृति एक तेजस्वी और धारदार तलवार में बदल गई. इसी तलवार को असी नाम दिया गया. ब्रह्मा जी ने इस तलवार को जगत की रक्षा और देवद्रोही असुरों के विनाश के लिए प्रकट किया था. इसके बाद यह भगवान शिव को प्राप्त हुई थी.

कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस दिव्य तलवार की सहायता से कई शक्तिशाली राक्षसों का अंत किया था. इसके बाद यह तलवार भगवान विष्णु और फिर अन्य देवताओं तक पहुंची. आगे चलकर यह कई महान योद्धाओं के पास रही. अंततः इस तलवार का संबंध द्रोणाचार्य से भी जोड़ा जाता है.

असी तलवार की सबसे बड़ी विशेषता इसकी धार और शक्ति बताई जाती है. पौराणिक वर्णनों के अनुसार, यह इतनी शक्तिशाली थी कि बड़े से बड़े कवच को भेद सकती थी. सामान्य तलवारें इसके सामने बेहद कमजोर मानी जाती थीं. कहा जाता है कि द्रोणाचार्य ने जब अपने पुराने मित्र द्रुपद से राज्य का हिस्सा मांगा और इसके बदले उन्हें युद्ध का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने द्रुपद को पराजित करने के लिए अपनी युद्ध-कला का प्रदर्शन किया.

हालांकि, महाभारत के युद्ध में असी तलवार का इस्तेमाल बहुत अधिक होने का वर्णन नहीं मिलता. इसके बावजूद पौराणिक कथाओं में इसकी शक्ति का वर्णन बेहद प्रभावशाली तरीके से किया गया है. लेकिन असी तलवार का मुकाबला करने वाली एक और तलवार थी, जिसे हमारी सूची में तीसरे नंबर पर रखा गया है.

नरसिंह तलवार
तीसरे नंबर पर है नरसिंह तलवार. महाभारत के पांच पांडवों में नकुल का नाम सबसे ज्यादा उनकी सुंदरता, अश्व विद्या और तलवारबाजी के लिए लिया जाता है. नकुल युद्ध-कला में बेहद कुशल थे और तलवार चलाने में उन्हें विशेष महारत हासिल थी.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नकुल के पास एक अद्भुत तलवार थी, जिसे नरसिंह तलवार के नाम से जाना जाता था. कहा जाता है कि इंद्रप्रस्थ के निर्माण के समय भगवान कृष्ण की प्रेरणा से विश्वकर्मा जी ने पांडवों के लिए कई दिव्य वस्तुओं और अस्त्र-शस्त्रों की व्यवस्था की थी. इसी दौरान नकुल को यह विशेष तलवार प्राप्त हुई थी.

जब पांडवों को वनवास मिला, तब नकुल ने इस तलवार का इस्तेमाल अपनी और अपने भाइयों की सुरक्षा के लिए किया. वनवास के दौरान उन्हें कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ा और ऐसे समय में उनकी तलवारबाजी बेहद उपयोगी साबित हुई थी. कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम चरण में भी नकुल ने अपने युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया. युद्ध के 18वें दिन उन्होंने कर्ण के पुत्रों सुषेण, सत्यसेन और प्रसन्न के साथ युद्ध किया और उन्हें पराजित किया था.

नरसिंह तलवार की शक्तियों की बात करें तो पौराणिक कथाओं में इसे बेहद खास बताया गया है. कहा जाता है कि इसका निर्माण ऐसी विशेष धातु से हुआ था, जिस पर समय का प्रभाव आसानी से नहीं पड़ता था. मान्यता है कि यह तलवार भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की शक्ति से अभिमंत्रित थी. यही कारण था कि इसकी मारक क्षमता सामान्य तलवारों की तुलना में कहीं अधिक मानी जाती थी.

नंदक तलवार
नंदक तलवार भगवान विष्णु की तलवार थी. पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु के इस दिव्य शस्त्र की शक्ति का वर्णन मिलता है. कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने कई शक्तिशाली दैत्यों और असुरों के विनाश में इसका इस्तेमाल किया. इसकी धार इतनी तेज बताई जाती है कि बड़े से बड़े अस्त्र और कवच भी इसके सामने टिक नहीं सकते थे.

नंदक तलवार को भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि आगे चलकर यह दिव्य तलवार भगवान परशुराम को प्राप्त हुई थी. परशुराम जी को महान योद्धा और भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है. उन्होंने अपने पराक्रम और शस्त्र विद्या के बल पर अनेक युद्ध लड़े थे. पौराणिक कथाओं में नंदक तलवार और परशुराम जी के युद्ध कौशल का विशेष महत्व बताया गया है. कहा जाता है कि भगवान परशुराम और भीष्म पितामह के बीच हुए युद्ध में दोनों महान योद्धाओं ने अपनी-अपनी युद्ध-कला का प्रदर्शन किया था. भीष्म के पास भी एक शक्तिशाली तलवार थी, जिसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में मिलता है.

चंद्रहास तलवार
भगवान शिव की चंद्रहास तलवार. चंद्रहास का अर्थ होता है चंद्रमा के समान चमकने वाली. पौराणिक कथाओं में इस तलवार को भगवान शिव का अत्यंत शक्तिशाली दिव्य शस्त्र बताया गया है.

रामायण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, एक बार रावण भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत पर पहुंचा था. वहां उसने कैलाश को अपने रास्ते की रुकावट समझकर अपनी भुजाएं पर्वत के नीचे लगा दीं और उसे उठाने का प्रयास करने लगा था. रावण के इस अहंकार को देखकर भगवान शिव ने बिना किसी विशेष प्रयास के अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया. पर्वत के दबाव में रावण की भुजाएं फंस गईं और वह पीड़ा से कराहने लगा.

इसके बाद रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति की. इसी प्रसंग को शिव तांडव स्तोत्र से भी जोड़ा जाता है. रावण की भक्ति और स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मुक्त किया और उसे चंद्रहास तलवार प्रदान की थी. चंद्रहास को लेकर मान्यता है कि यह भगवान शिव की दिव्य शक्ति से संपन्न थी. इसकी चमक चंद्रमा के समान बताई जाती है और इसकी शक्ति की तुलना देवराज इंद्र के वज्र से भी की जाती है.

रामायण के अनुसार, जब माता सीता के हरण के समय जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया था, तब दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था. इसी युद्ध में रावण ने अपनी तलवार से जटायु के पंख काट दिए थे. कहा जाता है कि रावण ने अपनी विजय यात्राओं और युद्धों में भी चंद्रहास का इस्तेमाल किया था. इसकी शक्ति इतनी प्रचंड मानी जाती थी कि बड़े-बड़े योद्धाओं के लिए भी इसका सामना करना बेहद कठिन था. यही वजह है कि पौराणिक कथाओं में चंद्रहास को सबसे शक्तिशाली दिव्य तलवारों में से एक माना जाता है.

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