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सडन डेथ और कोविड वैक्सीन कनेक्शन पर बड़ा खुलासा, मौतों पर रिसर्च से भ्रांतियां हुई खारिज

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भोपाल 
 देश में कोविड वैक्सीन के बाद अचानक मौतों (सडन डेथ) को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. सवाल ये कि क्या केविड-19 वैक्सीन और सडन डेथ के बीच कोई कनेक्शन है? इन सवालों पर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के महानिदेशक और केंद्रीय अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने रिसर्च आधारित आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट की है. उन्होंने साफ कहा, '' कोविड वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है और इससे मृत्यु का खतरा नहीं, बल्कि गंभीर कोविड में मौत की संभावना 90 प्रतिशत तक कम हुई है.''

700 अचानक मौत के मामलों पर रिसर्च

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ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल के अनुसार, '' आईसीएमआर द्वारा की गई केस-कंट्रोल स्टडी में सामने आया कि जिन लोगों ने वैक्सीन ली थी, उनमें अचानक मृत्यु का जोखिम उन लोगों की तुलना में 50 प्रतिशत कम था, जिन्होंने वैक्सीन नहीं ली थी. यह अध्ययन 700 सडन डेथ मामलों पर आधारित था, जिसने वैक्सीन को लेकर फैल रही भ्रांतियों को काफी हद तक खारिज किया है. कोई भी वैक्सीन काफी रिसर्च के बाद बनाई जाती है जिसमें साइड इफेक्ट व एफेकेसी पर खासा ध्यान दिया जाता है, ऐसा हर देश में होता है. आप अगर देखें तो देश में कोविडशील्ड और कोवैक्सीन ने कई लाख लोगों की जान बचाई है''

साइड इफेक्ट्स को लेकर फिर हुईं कई रिसर्च

आईसीएमआर महानिदेशक ने कहा, '' वैक्सीन को लेकर शुरुआत में कुछ रेयर साइड इफेक्ट थे पर अब तो कोविड भी खत्म हो चुका है. लेकिन लोगों ने कई तरह से चीजों को वैक्सीन के साथ जोड़ लिया और कहने लगे कि ये वैक्सीन की वजह से है. इसके बाद हमने कोविड वैक्सीन को लेकर फिर कई तरह की रिसर्च की, जिसमें 700 से ज्यादा अचानक मौत के मामलों पर भी रिसर्च की गई. सडन डेथ और वैक्सीन के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध नहीें था.''

एम्स ने भी की थी सडन डेथ पर रिसर्च

इससे पहले ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ने भी युवाओं में बढ़ते सडन डेथ व हार्ट अटैक के मामलों पर रिसर्च की थी. इसमें भी कोविड वैक्सीन और सडन डेथ पर फोकस किया गया. हालांकि, यहां भी रिसर्च में साफ कहा गया कि वैक्सीन और सडन डेथ के मामलों में कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं था. रिसर्च में बताया गया कि युवाओं में अचानक मौत का सबसे बड़ा कारण कोरोनरी आर्टरी डिसीज यानी ह्रदय रोग हैं. सडन डेथ के मामलों में बढ़ोत्तरी को लेकर कहा गया कि ये युवाओं की खराब होती लाइफ स्टाइल का नतीजा है.

पब्लिक हेल्थ को लेकर चल रही खास रिसर्च

आईसीएमआर देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए दो बड़े प्रोजेक्ट एलाइड और टैरिफ पर काम कर रहा है. एलाइड स्कीम 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए है, जबकि टैरिफ प्रोजेक्ट शून्य से 18 वर्ष तक के बच्चों और किशोरों पर केंद्रित है. इन प्रोजेक्ट्स के तहत स्वस्थ लोगों के हीमोग्लोबिन, बायोकेमेस्ट्री और अन्य हेल्थ पैरामीटर्स का व्यापक डेटा एकत्र किया जा रहा है, जिससे भारत की विविध जनसंख्या के अनुरूप नई स्वास्थ्य नीतियां बनाई जा सकें. डॉ. बहल के अनुसार, '' इन अध्ययनों के लिए देश के हर क्षेत्र जैसे उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और मध्य भारत से एक-एक साइट चुनी गई है, जिससे खान-पान और जीवनशैली की विविधता को सही तरीके से दर्शाया जा सके. एम्स भोपाल का पीडियाट्रिक्स विभाग भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा है और अगले दो वर्षों में इसके नतीजे सामने आएंगे.''
बेअसर साबित हो रहीं एंटीबायोटिक दवाएं

इस रिसर्च के साथ ही आईसीएमआर डीजी ने एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (एएमआर) को देश के लिए गंभीर खतरा बताया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा, '' इसे लेकर कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने भी लोगों से अपील की है. एंटीबायोटिक का ओवरयूज और मिसयूज यानी जरूरत न होने पर और गलत तरीके से इस्तेमाल बैक्टीरिया को मजबूत बना रहा है. आज आम सर्दी-खांसी में भी लोग बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक ले लेते हैं, जिससे बैक्टीरिया रेजिस्टेंस विकसित कर लेते हैं. इसका नतीजा यह है कि यूटीआई, निमोनिया जैसी सामान्य बीमारियों में भी दवाएं बेअसर होने लगी हैं. उन्होंने साफ संदेश दिया कि एंटीबायोटिक केवल डॉक्टर की सलाह पर, सही खुराक और तय अवधि तक ही ली जानी चाहिए.

डाक्टरों की रिसर्च में कम रुचि, चिंता का विषय

डॉ. बहल ने मेडिकल क्षेत्र में रिसर्च को मजबूत करने के लिए डॉक्टरों को पीएचडी के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया. उन्होंने बताया कि अमेरिका में हर 100 में से तीन डॉक्टर पीएचडी करते हैं, जबकि भारत में यह संख्या बहुत कम है. यह चिंता का विषय है. इसे बढ़ाने के लिए आईसीएमआर ने एम्स, पीजीआई जैसे संस्थानों के युवा फैकल्टी को पीएचडी के लिए ग्रांट और रजिस्ट्रेशन की सुविधा दी है. उनका मानना है कि यदि 10-20 प्रतिशत मेडिकल फैकल्टी भी पीएचडी करती है, तो देश में मेडिकल रिसर्च को नई दिशा मिलेगी.

कैंसर के अर्ली डिटेक्शन और इम्यून थेरेपी पर फोकस

डॉ. बहल ने बताया कि कैंसर को लेकर आईसीएमआर की प्राथमिकता अर्ली डिटेक्शन है. डॉ. बहल ने कहा, '' यदि कैंसर शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए, तो इसके पूरी तरह ठीक होने की संभावना बहुत अधिक होती है. देर से पता चलने पर मृत्यु दर बढ़ जाती है.इलाज के क्षेत्र में इम्यून थेरेपी पिछले एक दशक की बड़ी उपलब्धि है. इसमें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और कार-टी सेल जैसी तकनीकें शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल पहचानने और नष्ट करने के लिए प्रशिक्षित करती हैं. इसके साथ ही कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए नई जांच विधियों पर भी काम चल रहा है.''

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