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कैश कांड मामला: जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट, जांच पर उठाए सवाल

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नई दिल्ली 
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी, जिसमें उन्होंने लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को चुनौती दी है। यह समिति जज पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने लोकसभा स्पीकर के कार्यालय तथा लोकसभा और राज्यसभा के महासचिवों को नोटिस जारी किया और उनसे जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।

जांच समिति का गठन और पूरा मामला
यह जांच समिति लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा 12 अगस्त 2025 को जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3(2) के तहत गठित की गई थी। समिति में शामिल सदस्य हैं:
    सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार (अध्यक्ष),
    मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव,
-कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य।

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यह समिति 14 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने की घटना के बाद मिले जले हुए नकदी के बंडलों से जुड़े आरोपों की जांच कर रही है। आग बुझाने पहुंची दिल्ली फायर सर्विस और पुलिस कर्मियों ने जलें हुए नोटों के ढेर पाए थे, जिसके बाद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे।

इस घटना के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल हाईकोर्ट इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया गया और उनकी न्यायिक जिम्मेदारियां छीन ली गईं। पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना द्वारा गठित एक इन-हाउस जांच समिति ने भी आरोपों में दम पाया और हटाने की सिफारिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया। इसके बाद 146 सांसदों (सत्ता और विपक्ष दोनों पक्षों से) द्वारा हस्ताक्षरित हटाने का प्रस्ताव लोकसभा में स्वीकार किया गया, जिसके आधार पर जांच समिति बनी। हाल ही में, दिसंबर 2025 में समिति ने जस्टिस वर्मा को आरोपों का मेमो सौंपा और जवाब देने के लिए छह सप्ताह का समय दिया।

जस्टिस वर्मा की याचिका में मुख्य दलीलें
जस्टिस वर्मा की याचिका में लोकसभा स्पीकर के 12 अगस्त 2025 के उस निर्णय को असंवैधानिक करार देने की मांग की गई है, जिसमें केवल लोकसभा स्पीकर ने एकतरफा समिति गठित की। याचिका में कहा गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 का उल्लंघन है तथा जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है।

याचिका के अनुसार, जब दोनों सदनों में जज के हटाने का प्रस्ताव पेश किया जाता है या स्वीकार किया जाता है, तो जांच समिति का गठन लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए, न कि केवल लोकसभा स्पीकर द्वारा एकतरफा। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रस्ताव दोनों सदनों में पेश होने की स्थिति में समिति का गठन संयुक्त रूप से अनिवार्य है।

कानूनी प्रावधान
जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के अनुसार, जज के हटाने (इंपिचमेंट) का प्रस्ताव किसी एक सदन में स्वीकार होने पर स्पीकर या चेयरमैन (जैसा लागू हो) जांच समिति गठित करते हैं। यदि दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव पेश होता है और दोनों में स्वीकार होता है, तो समिति संयुक्त रूप से गठित की जाती है। वर्तमान मामले में प्रस्ताव केवल लोकसभा में स्वीकार हुआ, इसलिए स्पीकर द्वारा एकतरफा गठन कानूनी रूप से सही प्रतीत होता है, लेकिन याचिका इसी बिंदु पर चुनौती दे रही है।

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