तिरुवनन्तपुरम
केरलम में 10 साल के बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस ने आखिरकार मुख्यमंत्री के नाम पर अपनी फाइनल मुहर लगा दी है. वीडी सतीशन नए मुख्यमंत्री होंगे, जिनके नाम का ऐलान गुरुवार को दिल्ली में केरलम की प्रभारी दीपा दास मुंसी ने किया. चार मई को आए चुनाव नतीजे के बाद से मुख्यमंत्री की रेस में केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला के नाम चल रहे थे, लेकिन सियासी बाजी सतीशन के हाथ लगी।
केरल के सीएम को लेकर दस तक शह-मात का खेल चलता रहा, जो किसी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं रहा. एक तरफ दिल्ली दरबार में राहुल गांधी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल हैं, तो दूसरी तरफ केरल विधानसभा में अपनी धारदार बहस से सरकार की नाक में दम करने वाले वीडी सतीशन थ।
सतीशन ने जिस तरह केरल में अपनी पकड़ मजबूत की है, उसने यह साफ कर दिया है कि राज्य की जमीनी सियासत में फिलहाल उनका पलड़ा भारी है. केरलम जीत के हीरो भी सतीशन को माना जाता है. जमीनी पकड़ ही वीडी सतीशन की कांग्रेस के संकटमोचक और राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले वेणुगोपाल पर भारी पड़ी।
दिल्ली की 'पकड़' पर भारी पड़ी जमीनी 'हकीकत'
केरलम के मुख्यमंत्री के चुनाव करने में कांग्रेस ने ऐसे ही दस दिन नहीं लगाया बल्कि काफी मंथन और मशक्कत के बाद वीडी सतीशन के नाम पर अपनी फाइनल मुहर लगी है. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नीत UDF की करारी हार के बाद केरलम के कांग्रेस में एक बड़े बदलाव की मांग उठी थी. उस वक्त तक केरलम में केसी वेणुगोपाल का दबदबा निर्विवाद माना जाता था।
केसी वेणुगोपाल को हाईकमान का 'आंख और कान' कहा जाता है, दिल्ली की राजनीति में उनकी पकड़ा है, लेकिन हार के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि अब पुराने चेहरों और 'ग्रुप पॉलिटिक्स' से काम नहीं चलेगा. यहीं से वीडी सतीशन का उदय हुआ. सतीशन ने पार्टी के भीतर उस 'ग्रुपिज्म' (A और I ग्रुप) को चुनौती दी, जिसे वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला जैसे नेता नियंत्रित करते थे।
केरल कांग्रेस में कोई भी बड़ा फैसला वीडी सतीशन और प्रदेश अध्यक्ष के.सुधाकरन की मर्जी के बिना नहीं होता. वेणुगोपाल अभी भी दिल्ली में शक्तिशाली हैं और टिकट बंटवारे में उनकी भूमिका अहम रहती है, लेकिन केरल के 'कैप्टन' अब सतीशन ही हैं।
हालांकि वेणुगोपाल राहुल गांधी के करीब हैं, लेकिन राहुल गांधी खुद राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व चाहते थे।, सतीशन की साफ-सुथरी छवि और पांच बार विधायक रहने के अनुभव को राहुल ने वेणुगोपाल की सिफारिशों के ऊपर तरजीह दी।
कैसे सतीशन केरल की रेस में सब पर भारी पड़े?
सतीशन ने साबित कर दिया है कि दिल्ली की करीबी आपको पद दिला सकती है, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं का विश्वास आपको 'नेता' बनाता है। केरल में वेणुगोपाल की 'रिमोट कंट्रोल' वाली राजनीति पर सतीशन की 'डायरेक्ट एक्शन' वाली सियासत फिलहाल भारी पड़ती दिख रही है।
सतीशन के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह गई कि उन्हें युवा विधायकों और जमीनी कार्यकर्ताओं का भरपूर समर्थन मिला, जो बदलाव चाहते थे. केरलम में कांग्रेस को सत्ता में वापसी कराने में वीडी सतीशन का अहम रोल था. वेणुगोपाल का नाम सीएम के लिए जब उछला तो केरलम के अलग-अलग जिलों से सतीशन के पक्ष में आवाज उठने लगी. कांग्रेस हाईकमान ने जमीनी हकीकत को समझते हुए वेणुगोपाल के दिल्ली तो वीडी सतीशन को सूबे की सियासत में रखने का फैसला किया।
वेणुगोपाल को सीएम बनाने का फैसला करने पर दो सीटों पर उपचुनाव होता. केसी वेणुगोपाल लोकसभा सांसद हैं, जिनको अपनी सीट से इस्तीफा देना पड़ता. इसके बाद उन्हें विधानसभा सदस्यता के लिए किसी मौजूदा विधायक की सीट खाली करानी पड़ती. इस तरह एक लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराने पड़ते. सतीशन को लिए ऐसा कुछ नहीं करना है, जिसके चलते ही हाईकमान की पहली पसंद बने।
केरल की सामाजिक इंजीनियरिंग में सतीशन फिट
वीडी सतीशन और केसी वेणुगोपाल दोनों ही 'नायर' समुदाय से आते हैं, जो केरल की राजनीति में एक प्रभावशाली जाति मानी जाती है. पारंपरिक रूप से नायर वोट कांग्रेस के आधार रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी की पैठ और एलडीएफ (LDF) की नीतियों के कारण इसमें बिखराव देखा गया था।
सतीशन पिछले पांच बार से नायर बहुल सीट से चुनाव जीतकर आ रहे हैं, जिसके चलते उनकी सियासी पकड़ कांग्रेस के दूसरे नेताओं से ज्यादा नायर समाज पर मानी जाती है. सतीशन को सीएम बनाकर कांग्रेस इस बड़े वोट बैंक को फिर से अपने पाले में पूरी तरह एकजुट कर सकती है. ऐसे में कांग्रेस के भीतर अन्य नायर नेताओं रमेश चेन्निथला जैसे) के साथ सत्ता के संतुलन को भी बनाए रखना आसान होगा।
सतीशन को मुस्लिम लीग का खुला समर्थन
केरलम की सियासत में सत्ता की चाबी अक्सर ईसाई और मुस्लिम समुदायों के हाथ में होती है. सतीशन की सबसे बड़ी ताकत उनकी मजबूत धर्मनिरपेक्ष छवि है. उन्होंने ईसाई समुदायों के विभिन्न संप्रदायों के साथ गहरे संबंध विकसित किए हैं. चर्च के कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी और बाइबिल के प्रति उनके ज्ञान ने उन्हें अल्पसंख्यकों के बीच एक 'भरोसेमंद हिंदू नेता' के रूप में स्थापित किया है।
कांग्रेस की सबसे मजबूत सहयोगी इंडिया युनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ सतीशन के मधुर संबंध हैं. मुस्लिम लीग शुरू से ही वीडी सतीशन को सीएम बनाने के पैरोकारी करती रही है. इसकी एक वजह यह भी है कि मुस्लिम लीग नहीं चाहती थी कि कोई दिल्ली से आकर सीएम बने बल्कि सतीशन को सीएम बनाने के मजबूती से बात रख रही थी।
वीडी सतीशन ने केरलम का चुनाव सिर्फ कांग्रेस के नाम पर नहीं बल्कि यूडीएफ के नाम पर लड़ा था. ऐसे में कांग्रेस ने कोई नया राजनीतिक प्रयोग करने के बजाय वीडी सतीशन के नाम पर मोहर लगाने का काम किया. इस तरह एक तीर से कांग्रेस ने उन तमाम समीकरण को साधने की कवायद की है, जो उसका अपना सियासी आधार है. मुस्लिम लीग यूडीएफ गठबंधन को स्थिरता प्रदान करते हैं,जिससे मुस्लिम मतदाताओं में यह संदेश जाता है कि कांग्रेस एक ऐसे नेता को आगे बढ़ा रही है जो सबको साथ लेकर चल सकता है।
'नेहरूवादी वामपंथ' बनाम 'कट्टर वामपंथ'
सतीशन ने खुद को एक नेहरूवादी वामपंथ के रूप में पेश किया है. यह उनकी एक चतुर राजनीतिक चाल रही है. केरलम में वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव है. सतीशन का यह दावा कि एलडीएफ अब वामपंथी नहीं बल्कि दक्षिणपंथी है, उन उदारवादी वामपंथी मतदाताओं को आकर्षित करता है जो पिनाराई विजयन की कार्यशैली से नाराज थे।
सतीशन की एक शिक्षित, तर्कशील और संसदीय परंपराओं का सम्मान करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में उनकी छवि कांग्रेस को वैचारिक स्तर पर माकपा (CPI-M) के बराबर खड़ा करती है. इसीलिए कांग्रेस ने पांच बार के विधायक सतीशन को सीएम बनाकर केरलम की राजनीतिक विचारधारा को साधने की कवायद की है।
सतीशन का युवा नेतृत्व और नई पीढ़ी का जुड़ाव
कांग्रेस लंबे समय तक केरल में 'पुरानी पीढ़ी' के नेताओं के बीच संघर्ष के लिए जानी जाती रही है. वीडी सतीशन का सियासी उदय कांग्रेस के भीतर एक पीढ़ीगत बदलाव का प्रतीक है. कांग्रेस के तीन सीएम पद के दावेदार में वीडी सतीशन सबसे कम उम्र के थे. नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके पांच साल के कार्यकाल ने दिखाया है कि वे डेटा, तथ्यों और शोध के साथ सदन में सरकार को घेरने की क्षमता रखते हैं।
केरल का युवा वर्ग, जो रोजगार और 'ब्रेन ड्रेन' जैसे मुद्दों से परेशान है, सतीशन के विकासवादी और भविष्यवादी विजन (जैसे ग्लोबल जॉब वॉचडॉग और शिक्षा सुधार) से खुद को जोड़ पा रहा है. केरल कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से 'ए' (ओमन चांडी गुट) और 'आई' (के. करुणाकरण गुट) गुटों में बंटी रही है।
सतीशन का मुख्यमंत्री बनना इन पारंपरिक गुटों के वर्चस्व को चुनौती देता है और 'हाईकमान'के सीधे नियंत्रण वाली व्यवस्था को मजबूत करता है.वे किसी एक गुट के कट्टर समर्थक नहीं माने जाते, इसलिए वे पार्टी के भीतर एक 'सर्वमान्य रेफरी' की भूमिका निभा सकते हैं, जिसके लिए उनके नाम पर मुहर लगी है।
केरलम में भाजपा के विस्तार को रोकना
भाजपा केरल में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए 'हिंदू कार्ड' और ईसाई समुदाय के कुछ हिस्सों को साथ लाने की कोशिश कर रही है. सतीशन एक ऐसे नेता हैं जो हिंदू पहचान को बनाए रखते हुए भी अल्पसंख्यकों के बीच लोकप्रिय हैं. सतीशन के नेतृत्व भाजपा के लिए इस विमर्श को मुश्किल बना देता है कि कांग्रेस केवल तुष्टिकरण की राजनीति करती है।
सतीशन केरलम में कभी खुलकर मुस्लिम परस्त वाली राजनीति नहीं करते रहे हैं, जिसके चलते उन पर तुष्टीकरण का आरोप लगाना आसान नहीं है. ऐसे में सतीशन की तार्किक शैली भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे को केरल की 'प्रबुद्ध राजनीति' के धरातल पर कड़ा मुकाबला देती है. सतीशन को मुख्यमंत्री बनाना कांग्रेस के लिए 'न्यूनतम जोखिम और अधिकतम लाभ' वाला सौदा साबित हो सकता है।
वीडी सतीशन एक ओर तो नायर समुदाय के जरिए हिंदू वोटों को सुरक्षित करते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी विद्वता और धर्मनिरपेक्षता से अल्पसंख्यकों और युवाओं को भी साधते हैं. ऐसे में कांग्रेस उन्हें सत्ता की कमान सौंकर तो यह केरल में "नया केरल, नई कांग्रेस" के नारे को हकीकत में बदलने की दिशा में सबसे बड़ा कदम बढ़ाया है।









