1100 साल पुराना कैलादेवी शक्तिपीठ: नवरात्रि में उमड़ता आस्था का सागर, लक्खी मेले की भव्य छटा

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    करौली

    उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल कैलादेवी धाम करौली जिला मुख्यालय से करीब 23 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, जहां सालभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है।

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    इतिहासकार वेणु गोपाल शर्मा के अनुसार कैलादेवी माता की मूर्ति की स्थापना वर्ष 1114 ई. में महात्मा केदार गिरि ने की थी। इसके बाद 1116 ई. में खींची राजा मुकुंद दास ने मंदिर का निर्माण कराया, जबकि 1153 ई. में रघुनाथ दास खींची ने इसका विस्तार किया। बाद में 1753 में राजा गोपाल सिंह ने मंदिर को भव्य स्वरूप दिया। करौली राजघराने ने माता को कुलदेवी के रूप में स्थापित किया, जिसके बाद से मंदिर का महत्व लगातार बढ़ता गया।

    अरावली पर्वतमाला के बीच स्थित इस धाम में माता कैलादेवी के साथ मां चामुंडा की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर परिसर आज विशाल और भव्य स्वरूप में विकसित हो चुका है।

    कैलादेवी धाम में साल में दो बार मेला लगता है। चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां लख्खी मेला भरता है, जो करीब 20 दिन तक चलता है। इस दौरान 50 लाख से अधिक श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जिससे यहां लघु कुंभ जैसा दृश्य देखने को मिलता है। शारदीय नवरात्रि में भी करीब 10 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

    करौली राजपरिवार से जुड़े राजऋषि प्रकाश जती के अनुसार नवरात्रि में घट स्थापना के समय माता को धारण कराई गई पोशाक अष्टमी तक नहीं बदली जाती। इस दौरान माता के प्राचीन आभूषण भी धारण कराए जाते हैं। अष्टमी के बाद ही माता का विशेष शृंगार किया जाता है।

    मान्यता है कि विवाह, संतान प्राप्ति, नए वाहन पूजन या मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त माता के दरबार में दर्शन के लिए अवश्य आते हैं। बच्चों का पहला मुंडन संस्कार भी यहां कराना शुभ माना जाता है।

    कैलादेवी धाम में भक्ति का अनोखा रंग लांगुरिया गीतों के रूप में देखने को मिलता है। ढोल-नगाड़ों की धुन पर श्रद्धालु नृत्य करते हैं। यहां भगवान कृष्ण को लांगुरिया के रूप में पूजा जाता है। माता के दर्शन के बाद बोहरा भगत के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है। श्रद्धालुओं के अनुसार इनके दर्शन के बिना कैलादेवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

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